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भगवान राम का आदर्श प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सिद्ध हो

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डॉ. राघवेंद्र शर्मा

भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, लेकिन गौर से देखा जाए और उनके जीवन वृतांतों का अध्ययन किया जाए तो हम पाएंगे कि भगवान राम समस्त मर्यादाओं से परे हैं। उन्होंने अपने आचरण के माध्यम से ऐसी अनेक मर्यादाएं स्थापित कीं, जिनका अनुसरण करके कोई भी साधारण मनुष्य स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित कर सकता है। उनका जीवन दर्शन ऐसा है जो स्वयं अनेक मर्यादाओं को स्थापित करता है। उनके ऐसे परम पावन व्यवहार का शुभारंभ बचपन से ही हो जाता है। उदाहरण के लिए- जब भगवान राम अपने तीनों भाइयों- भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ गुरु वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं, तब अपने ईश्वरत्व को पूरी तरह त्याग कर गुरु और गुरु माता पर आश्रित ही रहते हैं। शिक्षा के दौरान गुरु वशिष्ठ और उनकी धर्मपत्नी देवी अरुंधति को भगवान राम अपने अभिभावक का दर्जा भी प्रदान करते हैं। उनका यही भाव तब गुरु विश्वामित्र के प्रति रहता है जब पिता दशरथ, राक्षसों का नाश करने के लिए उन्हें लक्ष्मण के साथ गुरु विश्वामित्र के हाथ सौंप देते हैं।

इस बेहद सौम्य और विनम्र स्वभाव के बावजूद राम सदैव अपने छोटे भाइयों को पुत्रवत स्नेह देते रहे और एक पिता की तरह सदैव उनकी राजी खुशी की चिंता करते रहे। बल्कि सदैव उन्होंने यह सुनिश्चित भी किया कि उनके तीनों भाई किसी भी खतरे का शिकार ना बनें और सुरक्षित रहते हुए अपने कर्तव्यों का भली भांति निर्वहन कर सकें। जब राम राक्षसी ताड़का का वध करते हैं तब उसे जन्म-जन्मांतरों के बंधनों से मुक्त करके उसके आत्मस्वरूप तेज पुंज को अपने में समाहित कर लेते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे जानते हैं ताड़का जन्मजात राक्षसी नहीं थी। ऋषि अगस्त्य द्वारा उसके राक्षस पति सुंद का शाप द्वारा वध किया गया था। अपने पति की मृत्यु का बदला लेने के लिए उसने अपने यक्ष स्वरूप का त्याग करते हुए राक्षसी प्रवृत्ति का चोला ओढ़ लिया था। कुछ कदम आगे चलकर राम अहिल्या का उद्धार भी करते हैं। इस भाव के साथ कि परिस्थिति वश अथवा अज्ञानता वश यदि कोई पाप हो जाए तो उसे कारित करने वाले पुरुष अथवा नारी को पाप का भागी सिद्ध नहीं किया जा सकता। ऐसा करके राम अहिल्यापति ऋषि गौतम को पश्चाताप की अग्नि से भी छुटकारा दिलाते हैं। क्योंकि उन्होंने क्रोधवश अपनी पत्नी को अनुचित श्राप दिया था। किंतु वास्तविकता का ज्ञान होने पर वे अपने शाप को वापस नहीं ले सकते थे। फलस्वरूप तभी से पुण्यों द्वारा अर्जित अपने लोक में स्थित होकर वे अपनी पत्नी की चिरकाल से प्रतीक्षा कर रहे थे। माता सीता से भगवान राम का प्रथम मिलन पुष्प वाटिका में हुआ तब वह अपने भावों पर नियंत्रण बनाए रखते हैं। क्योंकि उन्हें ज्ञात है सीता स्वयंवर कर्म आधारित प्रक्रिया है।

सीता स्वयंवर में समस्त विभूतियों के असफल होने के पश्चात राजा जनक द्वारा अनुचित शब्द कहे जाने पर लक्ष्मण का क्रोध सातवें आसमान पर होता है। वे भी प्रत्युत्तर में राजा जनक को कठोर वचन कह देते हैं। तब भगवान राम ना तो उन्हें रोकते हैं और ना ही डांटते हैं। क्योंकि वे ऐसा मानते हैं, वहां पर लक्ष्मण जी को अनुशासित करने के लिए गुरु अथवा अभिभावक के रूप में विश्वामित्र जी उपस्थित हैं। अतः उनकी उपस्थिति में स्वयं को वरिष्ठ प्रतिपादित करना उन्हें उचित प्रतीत नहीं होता। इसी समारोह में क्रोधाग्नि में ज्वलंतशील परशुराम जी द्वारा अनेक बार राम के आत्मसम्मान को आहत किया गया। किंतु फिर भी वे उन्हें लौटकर दंडात्मक प्रति उत्तर नहीं देते। क्योंकि वे परशुराम के आभामंडल को खंडित करना नहीं चाहते। वे जानते हैं कि त्रेता युग में परशुराम पापाचार में युक्त क्षत्रियों का संहार कर चुके हैं और आने वाले युगों में सनातन संस्कृति को उनके तेज बल की आवश्यकता पड़ने वाली है। माता कैकई द्वारा वर मांगने पर उन्हें 14 वर्षों का बनवास हुआ, तब वाल्मीकि रामायण के अनुसार लक्ष्मण जी पिता दशरथ जी को कारागार में डालने हेतु उद्वेलित थे। इस प्रण के साथ की अयोध्या के सिंहासन पर केवल श्री राम का ही अधिकार है। किंतु श्री राम ने पितु आज्ञा को ही सर्वोपरि माना और इसके लिए लक्ष्मण को प्रेम पूर्वक डांट भी पिलाई। श्रंगवेरपुर के भील राज गुह को प्राणों के समान प्रिय भाई भरत जैसा अपनत्व और सम्मान देकर प्रभु श्री राम यह प्रतिपादित करते हैं कि व्यक्ति को जाति से नहीं बल्कि उसके कर्मों से सम्मान अथवा असम्मान का अधिकारी माना जाना चाहिए।

आप केवट को अपने चरण धोने का सौभाग्य भी देते हैं। क्योंकि उसका तत्कालीन जीवन और पूर्व का मृत्यु वृतांत उन पर उधार था। कच्क्षप योनि में वह क्षीर सागर का वासी था। श्री हरि विष्णु के चरण स्पर्श करते वक्त शेषनाग जी ने फुंफकार कर उसे भस्म कर दिया। फल स्वरुप वह कच्क्षप प्रभु चरणों को छूने की आस मन में लिए मृत्यु को प्राप्त हुआ। तब योग निद्रा में लीन प्रभु ने उसे अंतर्मन से आशीर्वाद दिया था कि त्रेतायुग में, मैं स्वयं चलकर तुम्हारे पास आऊंगा और तुम्हारी शर्तों के अनुरूप तुम्हें अपने पैर पखारने की अनुमति प्रदान करूंगा। इसके बाद चित्रकूट पहुंचने तक उन्हें अपने अनेक भक्त, संत, महात्मा, ऋषि मुनि के रूप में मिले। लेकिन श्री राम ने स्वयं को भगवान प्रदर्शित न करते हुए भगवा का मान रखा और सभी के चरण स्पर्श करते हुए आगे बढ़ते गए। चित्रकूट में जब भरत जी उन्हें वापस लेने आए तो श्रीराम इनकार कर सकते थे लेकिन उन्होंने अंतिम निर्णय वहां उपस्थित गुरु वशिष्ठ समेत ऋषियों और राजा जनक के माध्यम से ही प्रतिपादित कराया। इससे जहां राम का बड़प्पन तो स्थापित हुआ ही, वहीं ऋषि-मुनियों, राजा जनक और उपस्थित माताओं का सम्मान भी बना रहा, साथ में भरत की भावनाएं भी आहत नहीं हुईं।

सीता अपहरण में शामिल मारीच को वे केवल इसलिए मोक्ष प्रदान कर देते हैं, क्योंकि वह अपनी इच्छा से नहीं बल्कि मजबूरी वश उस प्रसंग का हिस्सा बना था और राम के हाथों ही मरना चाहता था। माता शबरी को केवल गुरु का धाम ही नहीं दिया बल्कि उन्हें तब नवधा भक्ति का ज्ञान बताया, जब तत्कालीन स्वयंभू विद्वान खुद को भगवान का सच्चा भक्त बताते हुए भीलनी को तुच्छ साबित करने में लगे हुए थे। वे चाहते तो संकल्प मंत्र से रावण का वध कर सकते थे लेकिन सत्य की रक्षा के लिए वानरों का मान बढ़ाया। महाबली बाली का वध करके उसकी अपेक्षा बेहद कम शक्तिशाली सुग्रीव को मित्र बनाया, क्योंकि बाली मातांध होकर अनीति पर चल रहा था, जबकि सुग्रीव ने धर्म को साक्षी बनाए रखा।

विभीषण जी को गले लगाकर आदर्श स्थापित करते हैं कि सभी ओर से निराश होकर शरण आए व्यक्ति को सामर्थ्य अनुसार सहयोग अपेक्षित है। रावण के पास अंगद को भेज कर यह संदेश भी दिया कि शांति वार्ता के माध्यम से समस्या सुलझ सकती हो तो व्यापक नरसंहार को हर हाल में टाला जाना चाहिए। श्रीराम कर्मों का फल देते हुए बाली, मेघनाद, और रावण का भले ही वध करते हैं लेकिन तारा, सुलोचना और मंदोदरी आदि का हाथ जोड़कर सम्मान करते हैं। इस आदर्श के साथ कि स्त्रियां भले ही शत्रु पक्ष की क्यों ना हों, यदि वे अपने स्वजनों के पाप में शामिल नहीं हैं तो उन्हें सम्मान देना ही चाहिए। किंतु यदि स्त्री शूर्पणखा के समान स्वच्छंद और व्यभिचारणी हो तो उसको दंड देने में देर नहीं लगानी चाहिए।

हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहि सुनहि बहु विधि सब संता।।

यानी प्रभु श्री राम की कथा अनंत है। इसे संतों ने अनेक प्रकार से लिखा, गाया और प्रस्तुत किया है। इस दृष्टि से देखा जाए तो उनके समस्त गुणों, जीवन वृतांतों और दर्शन का वर्णन करना असंभव ही है। फिर भी जितना सीख पाया, उस आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता हैं कि मेरे राम समस्त मर्यादाओं से परे पुरुषोत्तम हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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