सुनील गावसकर अपनी किताब 'सनी डेज़' में लिखते हैं, "जिस तरह 1982-83 में मोहिंदर अमरनाथ ने पाकिस्तान और वेस्ट इंडीज़ में तेज़ गेंदबाज़ों को खेला उसे फ़िल्म में उतार कर हमेशा के लिए सहेज कर रखना चाहिए क्योंकि उन्होंने दिखाया कि दुनिया के सबसे तेज़ गेंदबाज़ों को न सिर्फ़ कामयाबी से खेला जा सकता है बल्कि अटैकिंग बैटिंग भी की जा सकती है."
गावसकर का कहना है कि अमरनाथ की एक और ख़ासियत उन्हें दूसरे बल्लेबाज़ों से अलग करती थी, वो ये कि वो अच्छी तरह पहचानते थे कि किस गेंद को न खेला जाए, उसे जाने दिया जाए.
हाल ही में मोहिंदर अमरनाथ की आत्मकथा प्रकाशित हुई है 'फ़ियरलेस, ए मेमॉएर' जिसमें उन्होंने अपने क्रिकेट जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को साझा किया है.

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मोहिंदर अमरनाथ की शख़्सियत का बड़ा हिस्सा था लाल रुमाल जिसे वो हमेशा अपनी पैंट की पिछली जेब में रखते थे.
मोहिंदर अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "जब भी मैं अपना किटबैग तैयार करता था सबसे पहले मैं अपने रुमाल को करीने से तह करता था. इसके अलावा पुराने हो जाने और टूट जाने के बावजूद कई सालों से मैंने अपने हेलमेट को भी नहीं बदला था."
"ऑस्ट्रेलिया में सन 1981 में मुझे दी गई आधी आस्तीन की कमीज़ भी मेरी शख़्सियत का हिस्सा बन गई थी. ये रिंकल फ़्री कमीज़ थी जिसे मैं रोज़ ड्रेसिंग रूम में ही धोता था ताकि मैं उसे अगले दिन पहन सकूँ."
मोहिंदर लिखते हैं, "मैं हमेशा वही गल्व्स पहनता था जिसे मैं पाकिस्तान दौरे से पहन रहा था. मेरे पास अपने पैड थे लेकिन मैं हमेशा मदन लाल के दिए पैड ही पहन कर मैदान में उतरता था. सिर्फ़ जो चीज़ मैं बदलता था वो थे मेरे मोज़े और अंडरपैंट."
मार्शल की गेंद से लगी चोटसाल 1983 के वेस्टइंडीज़ दौरे में मैल्कम मार्शल राउंड द विकेट आकर भारतीय बल्लेबाज़ों की पसलियों और मुँह को निशाना बना रहे थे.
मार्शल की एक गेंद को जब मोहिंदर हुक करने गए तो वो उम्मीद से ज़्यादा तेज़ी से आई. गेंद ने पहले मोहिंदर के गल्व्स को छुआ और सीधे उनके चेहरे से टकराई. उस गेंद की गति 140 किलोमीटर प्रति घंटा से भी तेज़ थी.
मोहिंदर लिखते हैं, "मुझे ऐसा लगा जैसे किसी लोहार ने जलता हुआ लोहा मेरे ऊपरी होंठ से छुआ दिया हो. तभी मैंने देखा कि मेरे चेहरे से खून निकलने लगा है. कुछ ही सेकेंड में मेरे दस्ताने और कमीज़ ख़ून से रंग गए. मुझे मेरी चोट से ज़्यादा चिंता मेरी लकी कमीज़ पर पड़े ख़ून के धब्बों की थी. जैसे ही मैं ड्रेसिंग रूम में पहुंचा मैंने दर्द की चिंता किए बग़ैर अपनी कमीज़ को धोना शुरू कर दिया."
जब उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया तो डॉक्टर ने उनकी चोट पर 12 टाँके लगाए. उनका जबड़ा तो सही सलामत था लेकिन आगे के दो दाँत आधे टूट गए थे.
इससे पहले भी सन 1977 में ऑस्ट्रेलिया के दौरे में पर्थ टेस्ट में जेफ़ टॉमसन ने मोहिंदर अमरनाथ की पसलियाँ करीब-करीब तोड़ दी थीं. चोट इतनी गहरी थी कि मोहिंदर बहुत मुश्किल से साँस ले पा रहे थे. उन्हें लगा था कि दम घुटने से उनकी मौत हो जाएगी.
इसके बाद लाहौर में इमरान ख़ान का बाउंसर उनके सिर में लगा था. इंग्लैंड में रिचर्ड हैडली के बाउंसर के सिर में लगने से वो बेहोश हो गए थे और उनके सिर में हेयरलाइन फ़्रैक्चर हो गया था.
मोहिंदर अमरनाथ के पिता लाला अमरनाथ ने अपने पहली ही टेस्ट में इंग्लैंड के खिलाफ़ शतक लगाया था. उन्होंने अपने तीनों बेटों को अंग्रेज़ी नाम दिए थे. सुरेंदर अमरनाथ 'टॉम' थे, राजेंदर अमरनाथ 'जॉन' थे और मोहिंदर अमरनाथ को 'जिमी' का नाम दिया गया था.
मोहिंदर अमरनाथ लिखते हैं, "मेरे पिता मुझे और मेरे भाई को सुबह साढ़े पाँच बजे जगा देते थे. हम लोग गीली घास पर बिना जूतों और पैड के प्रैक्टिस करते थे. हमें जल्द ही गीली घास पर स्किड करती हुई गेंद पर अपना बल्ला इस्तेमाल करने का महत्व समझ में आ गया था. बल्ले से मिस हुई गेंद सीधे हमारी पिंडलियों में लगती थी और पूरे शरीर में दर्द की एक लहर दौड़ जाती थी."
मोहिंदर लिखते हैं, "हम तीनों भाइयों को बीस लीटर वाले स्प्रिंकलर से पौधों में पानी देने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. इसका एक फ़ायदा ये हुआ कि हमारी बाहें मज़बूत हो गईं. हमारे पिता हमसे भारी गमले एक जगह से दूसरी जगह रखवाते थे जिससे हमारी पीठ, कलाइयाँ, बाहें और कंधे भी मज़बूत हुए."
सात साल के बाद खेला दूसरा टेस्ट मैच
19 वर्ष की आयु में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मद्रास टेस्ट में मोहिंदर अमरनाथ ने अपने टेस्ट जीवन की शुरुआत की थी.
अपने पहले ही टेस्ट में मोहिंदर ने दो दिग्गज आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों कीथ स्टेकपोल और इयान चैपल को क्लीन बोल्ड किया था लेकिन इसके बाद मोहिंदर को भुला दिया गया था.
उनको अपने अगले टेस्ट के लिए सात सालों का इंतज़ार करना पड़ा था. वो पहले न्यूज़ीलैंड के दौरे पर गए और फिर वहाँ से वेस्टइंडीज़ गए.
वेस्टइंडीज़ में उन्हें अपने जीवन में पहली बार दुनिया के सबसे तेज़ गेंदबाज़ों माइकल होल्डिंग और एंडी रॉबर्ट्स को खेलने का मौका मिला. उस सीरीज़ में उनके भाई सुरिंदर अमरनाथ की ख़राब फ़ॉर्म के कारण मोहिंदर को नंबर तीन पर प्रमोट किया गया.
सुनील गावसकर लिखते हैं, "एक टेस्ट में मैं दूसरे छोर पर बल्लेबाज़ी कर रहा था. मुझे याद है माइकल होल्डिंग की एक गेंद अचानक तेज़ी से उठकर मोहिंदर के सीने में लगी. मोहिंदर ने उस जगह मलने की कोशिश भी नहीं की जहाँ मिसाइल की तरह उन्हें गेंद आ कर लगी थी. जब मैं उसके पास पूछने गया कि वो ठीक तो है तो उसने शर्माकर जवाब दिया कि उसे कुछ नहीं हुआ है लेकिन मैं समझ सकता था कि उसे कितना दर्द हो रहा होगा."
तेज़ गेंदबाज़ी से कोई ख़ौफ़ नहींकिंग्सटन टेस्ट में वेस्ट इंडीज़ के गेंदबाज़ों ने भारतीय बल्लेबाज़ों को घायल करने के उद्देश्य से गेंदबाज़ी की.
अमरनाथ लिखते हैं, "हर बार जैसे ही गेंद बल्लेबाज़ के शरीर से टकराती, दर्शक और फ़ील्डर दोनों गेंदबाज़ की तारीफ़ करते. पूरा स्टेडियम 'गेट् हिम' के शोर से गूँज उठता. ऐसा लगता था कि हम पुराने रोम के कोलोसियम में खड़े हैं जहाँ हज़ारों दर्शक ग्लेडियेटर्स को अपने प्रतिद्वंद्वी को ख़त्म करने के लिए उकसा रहे हैं. ये सब देख रहे दोनों अंपायर मूक दर्शक की तरह खड़े रहे और उन्होंने तेज़ गेंदबाज़ों को ख़तरनाक खेल के लिए एक बार भी चेतावनी नहीं दी."
मोहिंदर लिखते हैं कि दूसरे दिन के पहले सत्र के खेल के बाद ये लग गया कि 'हम क्रिकेट नहीं खेल रहे बल्कि युद्ध लड़ रहे हैं.'
इसके बावजूद भारत की टीम ने 6 विकेट पर 306 रन बनाए और कप्तान बिशन बेदी को अपनी पारी घोषित करनी पड़ी क्योंकि बाकी के बल्लेबाज़ घायल हो चुके थे और खेलने की स्थिति में नहीं थे.
भारत ये टेस्ट 10 विकेट से हारा लेकिन मोहिंदर ने दूसरी पारी में 58 रन बनाकर सबको जता दिया कि तेज़ गेंदबाज़ी से उन्हें कोई ख़ौफ़ नहीं है.
लाहौर में शतकजब न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड की टीम भारत के दौरे पर आई तो मोहिंदर की फ़ॉर्म चली गई और उनके स्थान पर मदनलाल को टीम में खिलाया गया लेकिन जब ऑस्ट्रेलिया के दौरे के लिए भारतीय टीम को चुना गया तो मोहिंदर को टीम मे फिर जगह मिली.
ऑस्ट्रेलिया के दौरे में जिस तरह उन्होंने उस समय के सबसे तेज़ गेदबाज़ जेफ़ टॉमसन का सामना किया उसकी हर जगह तारीफ़ हुई.
सन 1982 के पाकिस्तान दौरे में जब मोहिंदर अमरनाथ ने लाहौर में शतक जमाया तो उनके पिता लाला अमरनाथ भी वहाँ मौजूद थे. वो उस समय रेडियो के लिए कमेंट्री कर रहे थे. मोहिंदर ने उनकी दिशा में अपना बैट उठाकर उनका अभिवादन किया.
लाला इस शतक से इतने खुश हुए कि उन्होंने पूरे प्रेस बॉक्स में मिठाई बाँटी. लाहौर में बेटे का शतक लगाना उनके लिए ख़ास था क्योंकि इसी शहर में लाला ने शुरुआती क्रिकेट खेली थी.
मोहिंदर लिखते हैं, "लाहौर के ग़द्दाफ़ी स्टेडियम में मेरी आंखों में आँसू आ गए. जब मैंने लाहौर में अपना दूसरा शतक पूरा किया तो मेरे पिता पवेलियन में आए. उसी समय किसी व्यक्ति ने गैलरी से चिल्ला कर कहा, 'वो देखो मोहिंदर अमरनाथ के पिता आए हैं.' बाद में पापाजी ने मुझे बताया, मैं इस दिन का हमेशा से इंतज़ार कर रहा था."
तकनीकी रूप से सबसे दक्ष बल्लेबाज़पाकिस्तान के बाद हुए वेस्टइंडीज़ दौरे में भी मोहिंदर अमरनाथ ने दो शतक लगाए. उनको 'मैन ऑफ़ द सिरीज़' घोषित किया गया. जिस तरह उन्होंने मैल्कम मार्शल, जोएल गार्नर, माइकल होल्डिंग और एंडी रॉबर्ट्स का सामना किया सुनील गावसकर ने उनके बारे में कहा कि हमारे पास मोहिंदर के रूप में तकनीकी रूप से सबसे दक्ष बल्लेबाज़ है.
गावसकर ने यहाँ तक कहा कि "मेरी नज़र में वो इस समय दुनिया के सबसे अच्छे बल्लेबाज़ हैं. तेज़ गेंदबाज़ी को उनसे बेहतर कोई नहीं खेलता."
रवि शास्त्री ने भी अपनी किताब 'स्टार गेज़िंग, द प्लेयर्स इन माई लाइफ़' में लिखा, "जिन बल्लेबाज़ों के साथ और विरुद्ध मैं खेला हूँ, मैंने मोहिंदर अमरनाथ से ज़्यादा साहसी बल्लेबाज़ नहीं देखा है. मैंने ऐसा कोई खिलाड़ी नहीं देखा जो इतनी चोटें खाने के बावजूद डटा रहा हो. जब भी उसे टीम से हटाया गया उसने दोगुने जोश और संकल्प के साथ टीम में वापसी की."
जब वेस्टइंडीज़ मे मार्शल की गेंद अमरनाथ के मुँह पर लगी, उन्हें स्ट्रेचर से बाहर ले जाया गया. एक घंटे बाद जब वो प्राथमिक उपचार के बाद पिच पर लौटे तो पहली ही गेंद को हुक कर छक्का लगाया.
विश्व कप के सेमी फ़ाइनल और फ़ाइनल में 'मैन ऑफ़ द मैच'मोहिंदर अमरनाथ 1983 विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम के सदस्य थे. उन्हें सेमी फ़ाइनल और फ़ाइनल दोनों मैचों में 'मैन ऑफ़ द मैच' का पुरस्कार मिला था.
वर्ल्ड कप फ़ाइनल को याद करते हुए मोहिंदर ने लिखा, "जब वेस्टइंडीज़ का अंतिम विकेट गिरा, मैंने यादगार के तौर पर स्टंप उखाड़ने की कोशिश की लेकिन वो इतने भीतर तक गड़े हुए थे कि वो बाहर निकल ही नहीं पाए. हम रात भर जश्न मनाते रहे."
"सुबह 5 बजे जाकर हमें खाना खाने की सुध आई. बहुत मुश्किल से हमें विक्टोरिया स्टेशन के बाहर खाने की एक जगह मिली. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हमारी जीत की ख़बर मिलते ही पूरे भारत में सार्वजनिक छुट्टी का ऐलान कर दिया."

मोहिंदर अमरनाथ दुनिया के अकेले क्रिकेटर थे जिन्हें दो बार क्रिकेट के सबसे विरले तरीके से आउट करार दिया गया.
सन 1985 के ऑस्ट्रेलिया दौरे में मोहिंदर ने ग्रेग मैथ्यू की तेज़ी से स्पिन लेती गेंद पर रक्षात्मक शॉट खेला. गेंद पिच पर लगने के बाद तेज़ी से स्टंप की तरफ़ गई.
मोहिंदर याद करते हैं, "क्रिकेट के नियमों के अनुसार मैं गेंद को अपने पैर, शरीर या बल्ले से विकेट पर जाने से रोक सकता था, लेकिन मैंने उसे रोकने के लिए अपने हाथों का इस्तेमाल किया. मुझे तुरंत ही अपनी गलती का एहसास हो गया. इस बीच विकेटकीपर और गेंदबाज़ ने अपील कर दी. मैं बहुत शर्मसार हुआ. इससे पहले कि अंपायर मुझे 'हैंडलिंग द बॉल' आउट देने के लिए अपनी उंगली उठाते मैं खुद ही पवेलियन की तरफ़ चल पड़ा."
उसी तरह श्रीलंका के कप्तान अर्जुन रणतुंगा की गेंद को खेलते हुए मोहिंदर पहले गेंद को हिट करने गए लेकिन आख़िरी क्षण पर उन्होंने अपना विचार बदलते हुए गेंद को अपने बल्ले से रोक दिया. वहां रन लेने या रन आउट होने की कोई संभावना नहीं थी.
मोहिंदर याद करते हैं, "मैं गेंदबाज़ को गेंद बढ़ाना चाह रहा था लेकिन मैं ये सोच कर रुक गया कि कहीं इसके लिए मुझे फिर 'हैंडलिंग द बॉल' आउट न दे दिया जाए. मैंने गेंद को धीरे से अपने पैर से गेंदबाज़ की तरफ़ किक किया लेकिन मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब गेदबाज़ ने मेरे ख़िलाफ़ अपील कर दी और मुझे 'ऑब्सट्रक्टिंग द फ़ील्डर' के लिए आउट करार दिया गया."
वो कहते हैं, "मैं क्रिकेट में दो सबसे विरले तरीकों से आउट होकर विश्व रिकॉर्ड बना चुका हूँ. मैं दुनिया का अकेला बल्लेबाज़ बन गया जो क्रिकेट में आउट होने के एक नियम 'टाइम आउट' को छोड़कर बाकी हर तरीके से आउट हुआ हूँ."
चयनकर्ताओं को कहा 'जोकरों का समूह'जब शारजाह में ठीक-ठाक प्रदर्शन करने के बावजूद मोहिंदर अमरनाथ को भारतीय टीम में नहीं चुना गया तो उनके सब्र का बांध टूट गया.
उन्होंने चयनकर्ताओं को 'जोकरों का समूह' कहा और उन पर आरोप लगाया कि उनका सरनेम भारतीय क्रिकेट को चलाने वालों को पसंद नहीं है.
कुछ समय बाद उन्होंने क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा कर दी. अपने 18 साल के इंटरनेशनल करियर में मोहिंदर अमरनाथ ने 69 टेस्ट खेले. उन्होंने 11 शतकों के साथ 4378 रन बनाए. उन्हें 1984 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया. सन 1983 में विज़्डेन ने उन्हें वर्ष के पाँच सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में चुना.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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